कविता "ऐ काले बादल सुनो ज़रा"
ऐ काले बादल सुनो ज़रा
कल आँगन मेरे आना तुम
कल साजन आएंगे मेरे
खूब उमड़-घुमड़ कर छाना तुम
ऐ काले बादल सुनो ज़रा
कल आँगन मेरे आना तुम
दिन ये कजरारी रैन लगे
जैसे मेरे ये नैन लगे
पर साजन देख सकें मुझको
पल पल बिजली चमकाना तुम
ऐ काले बादल सुनो ज़रा
कल आँगन मेरे आना तुम
जब साजन पास मेरे आएं
पल्लू लहराकर गिर जाए
फिर झुके लाज से जब गर्दन
ज़ुल्फ़ें मेरी लहराना तुम
ऐ काले बादल सुनो ज़रा
कल आँगन मेरे आना तुम
जब साजन छुए मेरे तन को
बेसुध हो इशक़ ख़ुमारी में
जब संगम हो यमुना गंगा सा
भर लें कसकर अंकवारी में
फिर मस्त फुहारों को लेकर
थोड़ा नीचे झुक आना तुम
ऐ काले बादल सुनो ज़रा
कल आँगन मेरे आना तुम
कल साजन आएंगे मेरे
खूब उमड़-घुमड़ कर छाना तुम।।
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