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कविता "बीएनए बैच 18 - 20 के नाम"

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एक दौर ऐसा  जो था अपने मे सम्पूर्ण नहीं थी ज़रूरत उसे भूत और भविष्य की वो खुद में समेटे  भूत भविष्य वर्तमान एक भरा पूरा युग था  और हम खड़े थे उसमे पूरे ज़िंदा  सोख लिया उसके  हर एक कतरे को  ऐसे जैसे शाश्वत समय सोख लेता है सब कुछ उस युग के साक्षी साथियों कहो...हैं न एहसास एक अदभुत आनन्द का  कि हमने पूरे ज़िंदा होकर  जिया है एक पूरा युग  जो था अपने मे सम्पूर्ण

कविता "ऐ काले बादल सुनो ज़रा"

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ऐ काले बादल सुनो ज़रा  कल आँगन मेरे आना तुम कल साजन आएंगे मेरे खूब उमड़-घुमड़ कर छाना तुम ऐ काले बादल सुनो ज़रा  कल आँगन मेरे आना तुम दिन ये कजरारी रैन लगे जैसे मेरे ये नैन लगे  पर साजन देख सकें मुझको पल पल बिजली चमकाना तुम ऐ काले बादल सुनो ज़रा  कल आँगन मेरे आना तुम जब साजन पास मेरे आएं पल्लू लहराकर गिर जाए फिर झुके लाज से जब गर्दन  ज़ुल्फ़ें मेरी लहराना तुम ऐ काले बादल सुनो ज़रा  कल आँगन मेरे आना तुम जब साजन छुए मेरे तन को बेसुध हो इशक़ ख़ुमारी में जब संगम हो यमुना गंगा सा भर लें कसकर अंकवारी में फिर मस्त फुहारों को लेकर थोड़ा नीचे झुक आना तुम ऐ काले बादल सुनो ज़रा  कल आँगन मेरे आना तुम कल साजन आएंगे मेरे खूब उमड़-घुमड़ कर छाना तुम।।

कविता "देखो तुम्हारे अंदर मैं हूँ"

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नही मैं तुम्हे छूना नहीं चाहता  कहीं लहरें न उठने लगे और तुम अशांत ना हो जाओ नहीं मैं तुममें उतरना भी नहीं चाहता कहीं नीचे बैठी मैल हिल न जाये  और तुम्हारी निर्मलता को मैला न कर दे फिर सवाल उठता है कि मैं चाहता क्या हूँ शायद......मैं चाहता हूँ ..... तुम यूं ही शांत निर्मल और स्थिर रहो  और मैं किनारे बैठकर  तुममें खुद को देखता रहूं  और खुश होकर सोच सकूं देखो तुम्हारे अंदर मैं हूँ।